Followers

Monday, January 1, 2018

उम्मीदों की नयी शुरुआत



सबसे पहले तो Ravish Kumar जी को शुक्रिया, एक बेहद संजीदे पत्रकार ने प्रेम के कथाओं को गढ़ने का नया तरिका इजाद किया 
उसके पहले Divya को भी थैंक्स, उनके टर्म्स एंड कंडीशन एप्लाय को पढ़ते हुए ही पहली बार लगा था कि ऐसी ढेरों कहानियां मेरे इर्द गिर्द हाइड एंड सीक खेल रही, पर उन्हें शब्द देते हुए इतना बड़ा करना ताकि पाठक उसको जीने लगे, ये नहीं आया ! 
समय के साथ, ढेरों लघु प्रेम कथाएं टाइम पास के जज्बे को लिए फेसबुक के स्टेटस अपडेट का मसाला समझ कर गढ़ा, कुछ करीबी मित्रों यथा AparnaAbhaLalityaप्रीतिशाह नवाज़,DrPriti, Nanda, बबलीPravinBhavna ShekharAmitPraveshSwatiरवि, Menka, NeeluNeetaAnjuAmitaNeelimaSamta, Ranju. Ashaअनु,, RashmiRekhaNirmalaShaliniNutanसारिकाSarikaDaisyAbhijeetPoonamKavita (सबके साथ जी  ) ने हर बार कहा ये कागजों पर ठीक ठाक लगेगी | शुरूआती दिनों में अनुप्रिया के रेखाओं के साथ इसको प्रकाशित करें, इस तरह भी सोचा था, पर समय के साथ वो बात भी ठन्डे बसते में चली गयी | एक कन्फ्यूज्ड व्यक्ति हर समय मेरे अन्दर से आवाज लगाते रहा - बेवकूफ सभी तुम्हे उल्लू बना रहे  ! और तो और मेरी दीदी जिसने मेरी कविताओं के लिए मुझे हर बार सराहा वही इस कहानी के लिए सबसे बड़ी आलोचक रही तो घबडाना वाजिब ही था 
फिर Om Nishchal जी ने विश्वास दिलाया - हाँ ये किताब में आये तो बुरा नहीं लगेगा| मुझे फिर भी लगा एक वरिष्ठ मित्र शायद कहीं मेरे साथ मस्ती कर रहा है | फोन किया, उन्हें पकाया, उन्होंने दिलासा दिलाया - ये औसत से थोड़ी बेहतर हैं, इन्हें कागजों में उतारना, बुरा ख्याल नहीं है 
जब नोटबंदी सीरिज की तीन प्रेम कथाओं को Tejendra सर ने अपने पुरवाई में छापा, विश्वास और मजबूत हुआ | आखिर कई प्रकाशकों से बात की, खुल कर बोल पाने कि स्थिति में कभी नहीं था फिर भी कईयों ने ई-बुक के लिए कहा | मैंने कहा वो तो फेसबुक/ब्लॉग पर है ही, ई बुक जैसे शक्ल में ही | आखिर Maya Mrig जी ने कहा भेजो देखता हूँ | वर्ड फ़ाइल उनके इनबॉक्स तक पहुँच गयी| उन्होंने भी ऐसा भी भाव नहीं दिया कि लगे, मैंने कोई छक्का मार दिया 
पर पिछले शनिवार को उनका फोन आया - वो इसी बुक फेयर में इस किताब को लाना चाहते हैं और फिर मेरे आँखों के सामने "लाल फ्रॉक वाली लड़की" छमकने लगी 
ओह हो - भूल गया इन सबके बीच अपने कई मित्र जो रेखाओं और रंगों से खेलते हैं उनसे भी गुजारिश करता रहा कि कोई चटख रंगों वाली "लाल फ्रॉक वाली लड़की" मेरे लिए गढ़ दें | पर सबके पास अपनी अपनी वजह थीं, अपनी अपनी व्यस्तता  एक मित्र Savita G Jakhar हैं, जो कई वर्षों से मेरी लिस्ट वाली मित्र रहीं, फ्रांस में रहती हैं, इनकी चित्रकारी का सायलेंट व्यूअर शुरू से रहा, इनको भी इनबॉक्स कर दिया कि एक कॉम्प्लीमेंट्री पेंटिंग तो दे ही दो  समय का पता था नहीं, इन्होने सोचा कभी दे देंगे  पर इसी रविवार को इन्होने कुछ पेंटिंग्स दिखा कर मेरे से ऑप्शन्स पूछा और फिर तो बल्ले बल्ले  एक बेहद प्यारा कवर आपके सामने है 
___________________________
सौ बातों की एक बात: बोधि प्रकाशन से मेरे लघु प्रेम कथाओं की किताब "लाल फ्रॉक वाली लड़की" बस प्रकाशन के लिए तैयार है, विश्व पुस्तक मेले में इसका आगाज 7 जनवरी रविवार को होगा, और आप सबका स्नेह पाने के उम्मीद, पहले की तरह ताउम्र बनी रहेगी 

Saturday, December 16, 2017

स्मोकिंग इज इंज्यूरियस टू हेल्थ


जा रहा था अकेले
नहीं थी कोई फिक्र, नहीं हो रहा था लेट
था समय काटना, तो बस एक ढाबे पर
ली, सिगरेट की डब्बी
था उस पर बना भयानक सा चित्र
था लिखा भी
"स्मोकिंग इज इंज्यूरियस टू हेल्थ" !!

पढ़ा, देखा, व डरा भी
फिर भी स्टाइल से एक सिगरेट निकाली
माचिस की तीली से सुलगाई
गोल हुआ मुंह, बना धुएं का छल्ला
छल्ले में मौत का जिन्न !!
लेकिन साथ में था अंदर तक पहुँचता तेज लहर
ठीक वैसे जैसे महसूसा हो पहला स्पर्श !! इनक्रेडिबल !!

याद है न तुम्हे भी
हर कदम दर कदम खुद ही आगाह करते थे
पर, खुद ही उँगलियाँ थामे आगे भी बढ़ते थे
ये प्यार नही आसां कह कर
फिर, आसानी से छुड़ा ली थी तुमने ही अंगुलिया
जलते सिगरेट सा वजूद बना दिया न!!
अब जल रहा हूँ, जला रहा हूँ
कुछ राख कुछ अधजली सी सूरत
रह गए शेष
सुपुर्दे खाक की जिम्मेवारी तुम्हारी !!


~मुकेश~


Thursday, November 30, 2017

सत्रहवीं सालगिरह



मई 2000 की बात थी, जब पहली बार अपने शहर में, भैया के साथ अंजू जिस लखोटिया कंप्यूटर इंस्टिट्यूट में जॉब करती थी, वहां मिलने गया था | अर्रंजड मैर्रेज का एक पार्ट था, वहां से निकले तो मैंने सहमते हुए भैया को कहा - पसंद नहीं आई पर उससे से भी तो पूछ लो ! उन्होंने मई की गर्मी में कोल्ड ड्रिंक पिलवाते हुए इतना थीसिस दे दिया कि पंद्रह मिनट के अन्दर ही सबसे खुबसूरत लगने लगी, और फिर करीब छः महीने हमने भी लबालब रोमांस के छौंक वाला जीवन जिया| अंततः 30 नवम्बर 2000 को दांपत्य सूत्र में बांध दिए गए थे 

सत्रह वर्ष हो गए, अपने उच्छ्रिन्ख्लता और उसके गंभीरता के गठबंधन को सहेजे जिए जा रहे हैं | बहुत सारे यादगार पल रहे, बहुत सारे ऐसे भी पल आये जिसने दर्द ही दिया और खूब दिया ! एक यादगार पल ये भी था कि पहली एनिवर्सरी हमने अपने बड़े बेटे के साथ मनाई

वर्ष 2010 को एनिवर्सरी का ही दिन था, दस वर्ष होने के ख़ुशी थी, कुछ अभिन्न लोगो को बुला भी रखा था, शाम के लिए अधूरी तैयारी सुबह ही हो चुकी थी, मंदिर गए फिर अंजू को छोड़ा और फिर ओफ्फिस बाइक से जा रहे थे ! तुगलक रोड थाने के पास एक दम साफ़ सुथड़े सड़क पर एक शराबी बीच सड़क पर लडखडाते हुए जा रहा था, और पता नहीं मेरे दिमाग को क्या हुआ, खाली सड़क में सिर्फ वही दिखा गले मिलाने को | सीधा बाइक लेजाकर उसको ठोक मारा, वैसे तो बाइक की स्पीड भी बेहद कम ही थी, पर हम दोनों गिरे, और मैं गिरते ही बेहोश हो गया | दो तीन मिनट बाद होश में आते ही पहले तो मैंने उसको ढूंढा क्योंकि धक्का तो मैंने मारा था, गलती मेरी ही थी | पर भाई साहब दूर लडखडाते हुए जा रहे थे| अब मैंने खडा होने की कोशिश की, तो मेरा टखना अन्दर की ओर एकदम से मुड़ गया, समझ ही नहीं आया की क्या हुआ, हथेली में भी बेहद पेन हो रहा था | कुछ लोग आ चुके थे | एक बार फिर से आराम से उठा, तो दर्द के बावजूद उठ गया, बाइक किसी व्यक्ति ने उठा दी, अब बाइक स्टार्ट करने के लिए जैसे ही किक मारी, उई अम्मा, फिर से टखना गजब तरीके से बाहर की ओर मुड़ गया | पुलिस भी आ गयी थी, मोबाइल से अंजू को बुला चुका था| फिर किसी भले आदमी ने घर पूछा, घर भी मेरा नजदीक ही था, तो उसने मुझे पीछे बिठा कर मेरी बाइक से घर पहुंचा दिया | दर्द जान निकाल रही थी, करीब एक घंटे बाद ओर्थोनोवा हॉस्पिटल पहुंचे, पता चला टखने का फिलामेंट कट गया और दुसरे तरफ के हाथ की हड्डी बुरी तरह से टूट गयी, जिसमें रोड डालेगा | इतना सुनकर मैडम को अब चक्कर आने लगा, समझ नहीं आ रहा था कौन किसका ध्यान रखे | तो एक यादगार एनिवर्सरी का दिन वो भी रहा |

कल अपनी एनिवर्सरी है
और आज रात
चलचित्र के भांति
सामने से गुजर रहा
तुम्हारा ये सत्रह साल का साथ !
पहली बार तुम्हारे ही ऑफिस मे मिलना
दूसरे बार एक साथ रिक्शे पर सफर
तीसरे बार इंगेजमेंट पर स्पर्श
और फिर चौथी, पाँचवी ... अंतहीन
सफर व साथ ... अबतक ... !!

जब भी मैं याद करता हूँ तुम्हारा प्यार
तो याद आता है तुम्हारा गुस्सा
पर साथ में मेरे लिए
तुम्हारा केयर व पोजेसिवनेस
कई बार देखा व परखा
जब भी हमारे में होते हैं झगड़े
तुम रैक पर रखे लकड़ी के लव वर्ड्स के चोंच को
लगती हो मिलाने
घर के ईशान कोण पर
थोड़ा पानी का रखना
ताकि दाम्पत्य जीवन रहे खुशहाल !

याद है मुझे
तुम्हें नहीं था पसंद
चाय, चाकलेट, बिस्किट आदि
और भी बहुत कुछ !
पर आज वो सब है पसंदीदा
क्योंकि तुम्हें चाहिए बस मेरा साथ !
याद है मुझे वो दिन भी
जब हाथ-पैर दोनों तुड़वा बैठा था
और तुम दिखाना चाह रही थी साहस
पर डाक्टर के सामने
तुम्हारी बेहोशी के साथ दिखी तुम्हारी
बेचैनी और प्यार !

ओह 12 बजने वाले हैं
और देखो हम दोनों की मोबाइल का अलार्म
बता रही है
हमें एक दूसरे को करना है विश
क्योंकि हैं एक दूसरे के लिए अहम !
सदैव रहेंगे न !!
___________________________
आज हमारे शादी की सालगिरह है, आप सबके शुभकामनाओं की जरूरत है 






Saturday, November 18, 2017

टॉफ़ी



कुछ टॉफियों के रैपर से
निकाल कर गटक ली थी
लाल पिली नारंगी टॉफियाँ

फिर सहेज लिए रैपर्स, जिसमे था
स्वाद, खुशियाँ, प्यार

आज पुराने किताबों से झांकते
ये चटक रंगों के रैपर्स
एक पल को बोल गये ''धप्पा"

पलकें झपकाते हुए
मुस्काते चेहरे के साथ
हूँ अब तक विस्मृत !!

~मुकेश~



Tuesday, October 31, 2017

~करेले~


हरी लताओं से लटके करेले
सुर्ख पीले फूलों के साथ
खूब चटकीले व गड्डमगड्ड सी सतह वाले
हरे-हरे करेले
दिखते तो हैं ऐसे,
जैसे कुछ लम्बे व कुछ गोल
दिवाली की रात को
अंधियारे को दूर करने के लिए
लटके हो तारों में
हरे-हरे खिलखिलाते
तारों से प्रस्फुटित प्रकाश!
पर,
मनभावन दिखने वाली
हर चमकती वस्तु
कहाँ होती है सुहानी
होंठो पर रखने भर से
शायद अन्दर का कड़वापन
दूर कर देने को रहती है
उतावली
नहीं कर पाते उदरस्थ
पर याद है, अम्मा समझाती
कि पढ़े हो न
"निंदक नियरे राखिये
आँगन कुटीर छवाय
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय"
खाओ तो कड़वा
पर कड़वापन होता है
रक्त प्रवाह को सहज करने का
एक उपाय।
नमकीले पानी से धुलकर
इन्द्रधनुष दिखाना
है इसका सहज स्वाभाव
मने
हर कड़वेपन में होता है
जिंदगी जीने का सच्चा फलसफा !
भीतरी कड़वाहट को निगलना
फिर घोंटने का उतावलापन
है बड़ी समझ और हिम्मत का काम
तभी तो कहते हैं न
कभी अनजाने कभी जानबूझ कर
मज़बूरी का कड़वा घूँट
देता है सार्थक दिशा जीवन के प्रवाह को
~मुकेश~



Wednesday, October 18, 2017

कुल्हड़



उफ़ ये सर्दी भी क्या न करवाए !

सर्द आहों से निकलती ठंडी वाष्प

चाय से भरे कुल्हड़ से निकलती गरम भाप
दोनों गडमगड हो कर
कुछ अजब गजब कलाकृति का कर रहे निर्माण !!

बनते रहे कुछ भी
हम तो बस,  तुमको ही पायेंगे
धुएं में भी .........
चेहरा तुम्हारा बनायेंगे
पानी,  पत्थर पर कई बार बना चुके
अबकी धुएं में बलखाती बालों वालीं मल्लिका !!
कुछ अजूबा !!  आश्चर्यजनक है ना !!
ये प्रतिबिम्ब तुम्हारा !

याद है न
तुम्हारे चश्मे पर
ठन्डे वाष्प की करके फुहार
कर अँगुलियों से कारीगरी
बना देते थे प्रेम प्रतीक
वही उल्टा तीन और मिला हुआ छोर
फिर कहते
एक बार इन प्रेम भरी नज़रों से देख लो न !

तुम्हारी छेड़खानियाँ भी तो कम न थी
मूँद कर खरगोश सी चमकती आँखों को
कहती तुम तो दिखते ही नहीं
मोतियाबिंद हो गया मुझे ...
और फिर पल भर में
चश्मा हटा
डाल आँखों में आँख धीरे से कह उठती ...
ये लो झाँक कर देख लो
नजर मेरी .........प्रेम भरी !!

अब  तो भाप से
संघनित हो
बन कर ओस के कण
छितर कर रह गया प्रेम ......
तुम्हारा मेरा !!

यादें प्रेम सिक्त हों तो
सर्दियाँ भी ख़ुशी भरती हैं..!!


Saturday, September 23, 2017

गुड बाय 'पापा'



'पापा' तो होते है 'आसमान'
एक बेहद संजीदा अभिव्यक्ति
कहती है ये 
फिर अंतिम बार उनसे मिलने
समय के कमी की वजह से
कर रहा था हवाई यात्रा
बेहद ऊंचाई पर था शायद
पड़ रहा था दिखाई
विंडो के पार दूर तलक
फटा पड़ा था आसमान
बिखड़े थे बादलों के ढेर इधर-उधर
पापा दम तोड़ चुके थे।
तेज गति से भाग रही थी ट्रेन
उसके स्लीपर कूपे में बैठा
द्रुत गति से भाग रहा था अशांत मन
टाइम फ़्रेम को छिन भिन्न कर
बना रहा था रेतीली मिट्टी के घरौंदे
पर, गृह प्रवेश से पहले
टूट चुके थे ख़्वाब
मिट्टी में ही तिरोहित हो चुके थे पापा
ट्रेन फिर भी भाग रही थी
अपने सहज वेग के साथ।
अब ऑटो से चल पड़ा
रेलवे स्टेशन से पापा के करीब तक
खटर-पटर करता रिक्शा
उछल कूद कर रही थी 
सुषुप्त संवेदनाएं,
सड़कों ने चिल्ला कर बताने कि
की कोशिश
स्मृति पटल पर चल पड़ी
पापा की 'मोपेड'
उनके कमर पर हाथ था मेरा।
मर चुके थे पापा
फिर भी उनकी ठंडी हथेली ने
भर दी थी गर्माहट
बेशक आंखे छलछलाई
पर रो नहीं सका एक भी पल
कंधे पे था स्नेहसिक्त हाथ
छोटे भाई का,
कहना चाहता था कुछ
लेकिन कुंद हो गयी आवाज
रुआंसा हो कह पाया
बस
गुड बाय 'पापा'

~मुकेश~

दैनिक जागरण, पटना में प्रकाशित